आत्मा गर्भ में कैसे आती है?

Language: Hindi | Published: 09 Oct 2022 | Views: 3
आत्मा गर्भ में कैसे आती है?
जीवात्मा कब और कैसे गर्भ (शरीर) में प्रवेश करती हैं ? :

जीवन का प्रवाह अनंत है, हम अगणित वर्षो से जीवित हैं और आगे अगणित वर्षो तक जीवित रहेंगे, भ्रमवश मनुष्य यह समझ कर बैठा है की जिस दिन शिशु माँ के गर्भ में आता है या गर्भ से उत्पन्न होता है, उसी समय से जीवन आरम्भ होता है और जब हृदयगति अथवा श्वासों की गति रुक जाने से शरीर निर्जीव हो जाता है और मृत्यु हो जाती है और उसके साथ ही जीवन का अंत हो जाता है, परन्तु ऐसा वास्तव में नही होता इसलिए पहले ही कहा गया है की जीवन का प्रवाह अनंत है.


जीवन और शरीर एक ही चीज़ नहीं है, जैसे वस्त्रो को हम समय समय पर बदलते रहते है, उसी प्रकार जीवात्माओ को भी शरीर बदलने पडते है। पुरे जीवन भर एक ही वस्त्र पहने नहीं रहा जा सकता, उसी प्रकार किसी जीवात्मा के अंनत जीवन के लिए एक शरीर नहीं ठहर सकता, इसलिए उसे बार बार बदलने की आवश्यकता पड़ती है। किसी भी जीवात्मा के लिए जीवन और मृत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक उस जीवात्मा को मोक्ष प्राप्त न हो जाये।


शरीर रूपी वस्त्र बदलने के इसी क्रम में जीवात्मायें इस भौतिक जगत पृथ्वी पर जन्म अथवा पुनर्जन्म के लिए आती है, और अपनी होने वाली माता के गर्भ में स्थापित हो जाती है और शिशु के मस्तिष्क को अनुरेखित करती अपनी सत्ता जमाती है।


यह समझना ठीक नहीं है कि, गर्भ में शिशु को बहुत कष्ट होता है, क्युकी उस समय तक गर्भ में शिशु का मस्तिष्क और इन्द्रिया अविकसित होने के कारण जीवात्मा को पूरी तरह से बंधित नहीं कर पाती और वह जीवात्मा माता के गर्भ को एक घोसले के सदृश्य रखती है और अपनी पूर्ण चेतना के साथ चारो और घूमती रहती हैं।


जन्म लेने समय पूर्व जब गर्भ में शिशु की इन्द्रियाँ पूर्णतः विकसित हो जाती है तो जीवात्मा की स्वतंत्रता थोड़ी नष्ट हो जाती है तब वह तुरंत उस गर्भ से नवजात शिशु के निकलने प्रयत्न करती है और इसी प्रयत्न को ही प्रसव काल कहा गया है और अन्ततः एक जीवात्मा भौतिक जीवन का सफर शुरू होता है।


Share this article:

Facebook | Twitter | WhatsApp