क्या है Doppler Test और प्रेगनेंसी क्यों जरूरी होता है ये टेस्ट
अक्सर प्रेगनेंट महिलाओं को डॉप्लर टेस्ट या स्कैन या अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए कहा जाता है। हालांकि, कई गर्भवती महिलाओं काे इस बात की जानकारी नहीं होती है कि डॉप्लर टेस्ट क्यों करवाया जाता है और इससे क्या पता चलता है।
why is doppler test done during pregnancy.
डॉप्लर स्कैन एक तरह का रेगुलर अल्ट्रासाउंड स्कैन ही होता है और इसमें हाई फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स का इस्तेमाल किया जाता है। नॉर्मल अल्ट्रासाउंड की तरह ही इसकी प्रक्रिया होती है और इसमें आप कंप्यूटर पर गर्भस्थ शिशु की तस्वीर देख सकते हैं।
रेगुलर अल्ट्रासाउंड से डॉप्लर स्कैन इसलिए अगल होता है क्योंकि ये रक्त वाहिकाओं में रक्त के प्रवाह, खून के प्रवाह की गति, दिशा और खून के थक्के के बारे में भी बताता है। आजकल अधिकतर अल्ट्रासाउंड में इनबिल्ट डॉप्लर फीचर होता है और दोनों ही स्कैन एक साथ किए जा सकते हैं।
क्या प्रेगनेंसी में डॉप्लर टेस्ट करवा सकते हैं
जी हां, गर्भवती महिला के लिए डॉप्लर स्कैन सुरक्षित है लेकिन आपको एक प्रशिक्षित अल्ट्रासाउंड डॉक्टर से ही ये स्कैन करवाना है। इस अल्ट्रासाउंट से शिशु की सेहत के बारे में पूरी जानकारी पाने में मदद मिलती है।
आमतौर पर प्रेगनेंसी की तीसरी तिमाही यानी 36 और 40वें सप्ताह में ग्रोथ स्कैन के साथ डॉप्लर स्कैन किया जाता है। हालांकि, अगर गर्भावस्था में कोई प्रॉब्लम हो तो इससे पहले भी डॉप्लर टेस्ट करवाया जा सकता है।
बेकिंग सोडा से घर पर करें प्रेगनेंसी टेस्ट
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गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पेशाब में एचसीजी यानी ह्यूमन कोरिओनिक गोनाडोट्रोपिन हार्मोन बनता है। बेकिंग सोडा पेशाब में इस हार्मोन की मौजूदगी को चेक करता है। पेशाब में बेकिंग सोडा के रिएक्शन से पता चलता है कि यूरिन में एचसीजी है या नहीं। अगर यूरिन में एचसीजी हुआ तो आप प्रेगनेंट हैं।
बेकिंग सोडा से प्रेगनेंसी टेस्ट करने के लिए एक चम्मच बेकिंग सोडा, दो सूखे कप और महिला के पेशाब की कुछ बूदें चाहिए होती हैं। टेस्ट करने के लिए सबसे पहले एक कप में पेशाब का सैंपल डालें। अब इसमें एक चम्मच बेकिंग सोडा डालें। कुछ मिनट तक इंतजार करें। इस टेस्ट के लिए सुबह के पहले यूरिन का ही इस्तेमाल करें।
अगर यूरिन में बेकिंग सोडा डालने पर बुलबुले उठते हैं या झाग बनते हैं तो इसका मतलब है कि टेस्ट पॉजीटिव है और आप प्रेगनेंट हैं। यदि कप में कोई रिएक्शन नहीं दिखता तो इसका मतलब है कि आप प्रेगनेंट नहीं हैं।
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कई बार गलत समय पर टेस्ट करने से प्रेगनेंट होने के बावजूद भी रिजल्ट नेगेटिव आ जाता है। इसलिए सही समय पर प्रेगनेंसी टेस्ट करना बहुत जरूरी है।
ओवुलेशन के एक सप्ताह के बाद इंप्लांटेशन होता है। इसके बाद ही शरीर में एचसीजी हार्मोन बनता है। इसलिए आपको पीरियड मिस होने के एक या इससे ज्यादा सप्ताह के बाद ही प्रेगनेंसी टेस्ट करवाना चाहिए। इससे पहले टेस्ट करने पर नेगेटिव रिजल्ट आ सकता है। ऐसे में दोबारा सही समय पर टेस्ट करें।
इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि बेकिंग सोडा से टेस्ट करने पर रिजल्ट बिल्कुल सही आता है। कुछ महिलाओं का रिजल्ट सही आ सकता है तो कुछ का गलत। कई बार पहली बार टेस्ट करने पर रिजल्ट नेगेटिव आ सकता है तो दूसरी बारी में पॉजीटिव रिजल्ट आ सकता है। इस वजह से ऐसा कहा जा सकता है कि बेकिंग सोडा प्रेगनेंसी टेस्ट पचास फीसदी ठीक होता है।
इसके बावजूद देश के कई हिस्सों में प्रेगनेंसी का पता लगाने के लिए बेकिंग सोडा से टेस्ट किया जाता है। प्रेगनेंसी का पता लगाने का यह तरीका सस्ता और गैर हानिकारक है। हालांकि, गर्भावस्था की पुष्टि करने के लिए आपको प्रेगनेंसी किट या डॉक्टर के पास जाकर टेस्ट करवाना ही पड़ेगा ।
तीसरी तिमाही से पहले डॉप्लर टेस्ट शिशु में जेनेटिक और कार्डिएक विकारों का पता लगाने के लिए किया जाना चाहिए। इस समय अल्ट्रासाउंड डॉक्टर को 5 से 10 मिनट से ज्यादा समय इस टेस्ट में नहीं लगाना चाहिए।
डॉप्लर और कलर स्कैन में थर्मल इंडेक्स थोड़ा अधिक होता है लेकिन फिर भी इसकी कम डोज सुरक्षित होता है। कम से कम समय के लिए आप इस स्कैन को कर सकते हैं। अधिकतर मामलों में डॉप्लर स्कैन सिर्फ कुछ मिनट के लिए ही किया जाना चाहिए।
डॉप्लर स्कैन या अल्ट्रासाउंड क्यों किया जाता है
यदि पेट में जुड़वां बच्चे हों, शिशु रीसस एंटीबॉडीज से प्रभावित हो, शिशु का स्वस्थ विकास न हो रहा हो, पहली प्रेगनेंसी में शिशु का आकार छोटा रहा हो, पहले देरी से मिसकैरेज हुआ या डिलीवरी के वक्त बच्चा मर गया हो, डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर से ग्रस्त प्रेगनेंट महिला को, जिनका बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) कम या ज्यादा हो तो इन स्थितियों में डॉप्लर टेस्ट किया जाता है।
प्लेसेंटा ठीक तरह से काम कर रहा है या नहीं, और इसे शिशु को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण मिल पा रहा है या नहीं, इस बात का पता लगाने के लिए भी डॉप्लर स्कैन किया जाता है।
डॉप्लर स्कैन से डॉक्टर को पता चलता है कि क्या शिशु की सेहत को ठीक करने के लिए कोई कदम उठाने या जल्दी डिलीवरी करवाने की जरूरत तो नहीं है।
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कैसे किया जाता है डॉप्लर अल्ट्रासाउंड
नॉर्मल अल्ट्रासाउंड की तरह ही डॉप्लर स्कैन किया जाता है। प्रेगनेंट महिला को टेबल पर लिटाकर पेट पर वॉटर बेस जैल लगाया जाता है। अब ट्रांसड्यूसर को पेट पर लगाया जाता है और इससे आप कंप्यूटर की स्क्रीन पर उसी समय अपने शिशु की तस्वीरें देख सकती हैं। इस स्कैन में केवल कुछ मिनट का समय लगता है और इसमें दर्द नहीं होता है।
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